ब्यूरो सोनभद्र
सोनभद्र। ”ऊर्जांचल कहे जाने वाले सोनभद्र में खनिज संपदा की बेलगाम लूट जारी है। बालू घाटों से लेकर स्टोन माइंस तक, हर जगह नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। प्रशासनिक सुस्ती के साए में चल रहे इस खेल से पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र तबाह होने की कगार पर है।”
बालू घाटों का हाल:
नदी के सीने पर चल रहीं जेसीबी
सरकारी नियमों के अनुसार नदी के तल से बालू निकालने के लिए सीमित और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों का इस्तेमाल होना चाहिए, लेकिन सोनभद्र में इन प्रावधानों को ताक पर रख दिया गया है।




बीच धारा में खनन:
नदी के प्राकृतिक स्वरूप और जल प्रवाह को दरकिनार करते हुए, सीधे जलधारा के बीच से अवैध रूप से बालू का उठान किया जा रहा है।
भारी मशीनों का प्रयोग:
पर्यावरण संरक्षण के सभी मानकों को ताक पर रखकर घाटों पर धड़ल्ले से जेसीबी (JCB) और अन्य भारी-भरकम मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे जलीय जीवन और नदी का अस्तित्व गंभीर संकट में है।
बोल्डर खदानों में एनजीटी (NGT) के नियमों की सरेआम धज्जियां
पत्थर और बोल्डर खदानों की स्थिति इससे भी अधिक भयावह है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और खनन विभाग के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद पहाड़ी इलाकों में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
हैवी ब्लास्टिंग (भारी विस्फोट)
पत्थरों को तोड़ने के लिए प्रतिबंधित और अत्यधिक शक्तिशाली विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अंधाधुंध ब्लास्टिंग से आसपास के गांवों की धरती कांप उठती है, रिहायशी मकानों में दरारें आ रही हैं और वन्यजीव दहशत में हैं।
असुरक्षित और गहरी खदानें
तय गहराई के मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज कर निर्धारित सीमा से कहीं अधिक गहराई तक अवैध खुदाई की जा रही है, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
प्रतिबंधित उपकरणों का उपयोग
खदानों में उन भारी मशीनों और अवैध तौर-तरीकों का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है, जिन पर पूर्ण प्रतिबंध है।
प्रशासन की चुप्पी और मंडराता भविष्य का संकट
सोनभद्र में चल रहा यह अवैध कारोबार सिर्फ पर्यावरण का नुकसान नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के भविष्य और जीवन के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है। यदि समय रहते जिम्मेदार विभागों और जिला प्रशासन ने इस पर सख्त शिकंजा नहीं कसा, तो यह खनन माफिया प्रकृति के इस अनमोल खजाने को पूरी तरह तहस-नहस कर देंगे।
अब सवाल यह उठता है कि क्या इस सनसनीखेज खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारी नींद से जागेंगे या प्रकृति का यह चीरहरण यूं ही बेखौफ जारी रहेगा?
